चुनाव 2019: विकृत होती बहस और सोशल मीडिया का दुरूपयोग

Samir Saran|Bedavyasa Mohanty

ऐसे में जब भारत डेढ़ महीने तक चलने वाले असहमतियों और ध्रुव्रीकरण से भरपूर आम चुनावों की ओर बढ़ रहा है, तो क्या हमारा देश लोकतंत्र की इस सबसे पवित्र प्रक्रिया के लिए खतरा बन चुकी फेक न्यूज (फर्जी समाचार), गलत सूचना और देश के भीतर तथा बाहर से संचालित हो रही चुनावों को प्रभावित करने की कार्रवाइयों के बारे में सतर्क हो चुका है? शीर्षतम सोशल मीडिया कम्पनियों के प्रमुखों की बैठक बुलाने सहित निर्वाचन आयोग की ओर से हाल ही में उठाए गए कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन इतना ही काफी नहीं है। हालां​कि इन कम्पनियों के बीच स्वेच्छापूर्ण नीति संहिता का होना महत्वपूर्ण है, लेकिन महज अनुचित राजनीतिक विज्ञापनों को हटाने और निर्वाचन आयोग के साथ ज्यादा कुशलता से सम्पर्क स्थापित करने भर से ही इस चुनौती से पूरी तरह निपटा नहीं जा सकता। इतने विलम्ब से किए जा रहे उपायों के बूते पर चुनाव में हस्तक्षेप के कई तरह खतरों के टल जाने की संभावना नहीं है, ये खतरे या तो कई महीने पहले ही अस्तित्व में आ चुके हैं या फिर भारत तेजी से बिगड़ती चुनाव व्यवस्था का नतीजा हैं।

आंकड़ों का संग्रह, फेक न्यूज, घेरकर मारने वाली भीड़ और राजनीति

2018 में, भारत में बच्चे चुराने के आरोप में 30 से ज्यादा व्यक्तियों की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इन हिंसक गतिविधियों की शुरुआत होने की वजह उन वीडियो और तस्वीरों के जरिए छेड़ी गई मुहिम थी, जिनमें लोगों को शिकार की तलाश में उनके आसपास घूम रहे बच्चे चुराने वालों और मानव अंगों की खरीद-फरोख्त करने वालों के प्रति आगाह किया गया था। इनमें, भारत में भीड़ की हिंसा की ज्यादातर अन्य घटनाओं की ही तरह अक्सर घुमंतु जनजातियों या धार्मिक और सांस्कृतिक गुटों को निशाना बनाया गया, पुराने मतभेदों का फायदा उठाया गया और नई दरारों के बीज बोए गए। ऐसा मालूम पड़ता है कि अब इस मुहिम की दूसरी पुनरावृत्ति जारी है और पहली बार की ही तरह यह भी सांप्रदायिक आंतरिक भाव ग्रहण करते हुए आगामी आम चुनावों को सीधे तौर प्रभावित कर सकती है।

कुछ खास लागों के समूहों में अविश्वास उत्पन्न करने के लिए इन अभियानों की समन्वयकारी प्रकृति और संदेशों का निर्माण (संदर्भ और भूगोलों के द्वारा) ही उन्हें इंटरनेट पर अफवाहें फैलाने वाले अन्य अभियानों से अलग करता है। अन्य संदेश, जो वर्तमान में तैयार किए जा रहे हैं, वे मुख्यत: चुनाव से संबंधित विषयवस्तु वाले हैं और सामाजिक मतभेदों की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने की पद्धति का ही पालन करने वाले जान पड़ते हैं। यही पद्धति गले में क्रॉस पहनकर चुनाव प्रचार करती प्रियंका गांधी वाली फेक न्यूज से लेकर, राहुल गांधी की चुनावी रैली के दौरान पाकिस्तानी झंडे लहराने की झूठी तस्वीरे दिखाने तक में परिलक्षित हुई है। इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खराब और भयावह रोशनी में दिखाते हुए फर्जी सूचना फैलाने वाले व्हॉटएप्प संदेश भी सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं। विडम्बना तो यह है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां व्हाट्सएप्प ग्रुप्स और टेक्स्ट मैसेजिस के जरिए लक्षित संदेश त्वरित गति से प्रसारित करने के लिए उन पर तेजी से निर्भर होती जा रही हैं। बुरा चाहने वालों ने भी अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए इन्हीं माध्यमों को चुना है।

इस तरह की मैसेजिंग के लिए डिजिटल माध्यम महत्वपूर्ण है। इनके जैसे हाइपर-टार्गेटेड अभियान टेलीविजन और रेडियो जैसे परम्परागत मीडिया पर शायद ही कभी मुमकिन हो। 

इस तरह की मैसेजिंग के लिए डिजिटल माध्यम महत्वपूर्ण है। इनके जैसे हाइपर-टार्गेटेड अभियान टेलीविजन और रेडियो जैसे परम्परागत मीडिया पर शायद ही कभी मुमकिन हो। सोशल मीडिया राजनीतिक दलों को अपने संदेश प्राप्तकर्ताओं के मुताबिक विविध तरह की पहचान गढ़ने की इजाजत देता है: शहरी शिक्षित लोगों के लिए विकास, ग्रामीण गरीबों के लिए परोपकारिता और राष्ट्रवादी जोश से भरपूर लोगों के लिए रक्षक की पहचान वाले संदेश बनाए जाते हैं। आंकड़ों के संग्रह और प्रसार के तरीके तैयार होते ही, अन्य कर्ताओं द्वारा हानि पहुंचाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाना एक तरह से निश्चित हो जाता है। उदाहरण के लिए, रूस के बारे में ऐसा मशहूर है उसने 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान पहले से ही विभाजित मतदाताओं को और ज्यादा बांटने के लिए नस्ल और अप्रवासन से संबंधित भड़काऊ संदेश फैलाने के लिए फेसबुक के हाइपर-टार्गेटेड विज्ञापनों का इस्तेमाल किया था।

इंटरनेट पर सोशल मीडिया अभियान जिस गति और दूरी को कवर करने में सक्षम होते हैं, उसने उन्हें स्टेट और नॉन-स्टेट एक्टर्स दोनों की ‘जरूरत’ बना दिया है। जर्मन चुनाव से ऐन पहले मतदाताओं को प्रभावित करने वाली इन कार्रवाइयों ने कुख्यात रूप से गुप्त राजनीतक रैलियों का आयोजन मुमकिन बनाया, जिनका समन्वय दूर-दराज के इलाकों से सोशल मीडिया के जरिए किया गया। इसलिए साइबरस्पेस में प्रभावित करने वाली इन कार्रवाइयों का असर अब केवल आभासी नहीं रह गया है, बल्कि वास्तविक दुनिया में उनके बहुत अचल और ठोस परिणाम सामने आ रहे हैं।

भारतीय, यूरोपीय और अमेरिकी अनुभव समान और लगातार चलने वाली इस गाथा के अंग हैं,जो तीनों को उत्तरदायी ठहराती है। पहचान और निजी जानकारी से फायदा उठाने का प्रयास करने वाला पूंजीवादी मॉडल भी सूचनाओं के संग्रहों और निजी आंकड़ों को पाने के अपार अवसरों की पेशकश करेगा, ताकि उनका इस्तेमाल व्यक्तियों, समुदायों और देशों के खिलाफ किया जा सके। दूसरा, इन आंकड़ों को तैयार और प्रॉसेस करने की सुगमता (और कम लागत) तथा इनका इस्तेमाल करने के इच्छुक स्टार्टअप्स, कार्पोरेशन्स और देशों — सभी को इन तक समान रूप से पहुंच प्राप्त है। आंकड़ों की व्यवस्था (या उनका अभाव) इस अति-संयोजित यानी हाइपर-कनेक्टिड और अति-अस्थिर दुनिया में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा है। तीसरा, इन सभी क्षेत्रों में राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले व्यक्तिगत सूचना आधार तैयार करने में शामिल रहे हैं। सोशल मीडिया के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और नागरिक सम्पर्क (और सूचना) पर आधारित प्रसिद्ध ‘ओबामा अभियान’ से लेकर अत्याधुनिक ‘मोदी अभियान’ तक, जिसमें मतदाताओं के साथ निजी सम्पर्क कायम करने के लिए संचार के पुराने चैनलों को दरकिनार किया गया, इन दोनों और अन्य नेताओं ने नागरिकों और उनकी प्राथमिकताओं से संबंधित आंकड़ों का विशाल ​संग्रह तैयार किया। आंकड़ों के इन संग्रहों को कौन नियंत्रित करता है? ये कितने सुरक्षित हैं? और क्या अब समय आ चुका है कि नियंत्रक यह सुनिश्चित करने के लिए इसमें हस्तक्षेप करे कि बाहरी व्यक्तियों या किसी कुख्यात ‘घर के भेदी’ द्वारा इन आंकड़ों का इस्तेमाल राष्ट्र के खिलाफ नहीं किया जा सके।

फेसबुक, ट्विटर, एल्गोरिथ्म्स और ईश्वर: कमान किसके हाथ में?

इस समय इन प्रभावित करने वाली कार्रवाइयों के निशाने पर लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं — मेनस्ट्रीम मीडिया और नियामक एजेंसियों जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता के बारे में शक के बीज बोए जा रहे हैं। अक्सर ऐसे बाहरी हस्तक्षेप के संकेतों की देशों के बीच तत्काल बिना सोच विचार किए प्रतिक्रिया होती है। उदाहरण के लिए, व्हाट्सएप्प पर फैलाई गई अफवाहों की वजह से होने वाली हत्याओं के कारण भारत सरकार ने 2018 के अंत में मध्यवर्ती उत्तरदायित्व कानूनों में संशोधनों का प्रस्ताव पेश किया था। अन्य बातों के अलावा ये संशोधन मध्यवर्तियों (या संचार सेवा प्रदाताओं) को अपनी प्रणालियों की ट्रेसेबिलिटी-संदेश को मौलिक रूप से भेजने वाले की पहचान करने की योग्यता शुरू करने का दायित्व सौंपते हैं। एंड-टू-एंड एंक्रिप्शन की क्षमता से युक्त प्लेटफार्म्स के लिए तकनीकी रूप से ऐसा कर पाना लगभग असम्भव है। इसलिए इस कानून का पालन करने के लिए कम्पनियों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे अपनी सेवाओ से एंक्रिप्शन हटाएं, मौलिक रूप से वे अपने प्लेटफॉर्म्स की निष्ठा से समझौता करें, जिस पर उपयोगकर्ता भरोसा करते हैं।

टेक्नोलॉजी कम्पनियों ने जिस आत्म-नियंत्रण संबंधी संहिता को अब अपनाया है, उसमें उन्हें यह तय करने की स्वतंत्रता दी गई है कि कौन सा राजनीतिक विज्ञापन आपत्तिजनक करार दिए जाने के योग्य है।

टेक्नोलॉजी कम्पनियों ने जिस आत्म-नियंत्रण संबंधी संहिता को अब अपनाया है, उसमें उन्हें यह तय करने की स्वतंत्रता दी गई है कि कौन सा राजनीतिक विज्ञापन आपत्तिजनक करार दिए जाने के योग्य है। यह बात खासतौर पर चिंताजनक इसलिए है, क्योंकि कथित उदार पूर्वाग्रहों और अनावश्यक रूप से दमघोंटू रूढ़िवादी विचारों को आश्रय देने के लिए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की पहले से ही नियंत्रकों द्वारा समीक्षा की जा रही है। इस तरह इन प्लेटफॉर्म्स को ज्यादा व्यक्तिपरक अधिकार देने से, ऐसे संगठनों को निर्णायक की भूमिका मिल जाती है, जिनका सृजन लोकतांत्रिक रूप से नहीं किया गया है और जिनकी भारत जैसे देशों में नागरिकों और नीति निर्माताओं के प्रति जवाबदेही भी सीमित है। जहां एक ओर ज्यादातर लोग ‘घृणा फैलाने वाले भाषण’ के हर तरह के स्वरूप के खिलाफ है, वहीं फेसबुक और ट्विटर को सेंसर की भूमिका निभाने का मौका देना हम सभी के लिए चिंता की बात है।

प्रभावित करने वाली कार्रवाइयों के खतरों की प्रतिक्रिया के रूप में इन कदमों को संस्थागत रूप प्रदान करना मूलभूत रूप से भारत के संविधान द्वारा प्रदान की गई स्वतंत्रताओं के मूल को प्रभावहीन बनाने की चेतावनी देता है। इसकी बजाए जवाबी कथानक तैयार करके दुष्प्रचार को नष्ट करने वाले लचीले और दीर्घकालिक समाधान तलाशने प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए। तथ्यों की जांच करने वालों, आधिकारिक माध्यमों और मेनस्ट्रीम मीडिया के बीच व्यापक तालमेल से दुष्प्रचार के अनेक स्रोतों को नाकाम किया जा सकता है। कम्पनियां पहले से ऐसे रास्ते तलाशने में जुटी हैं, जिनमें कृत्रिम आसूचना के माध्यम से फेक न्यूज अभियानों की पहचान की जा सके तथा उनकी गतिशीलता कम की जा सके। हालांकि इससे कोई जादुई चमत्कार होने की संभावना नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया को स्वचालित बनाने से इस दुर्भावनापूर्ण विषयवस्तु के प्रसार को काफी हद तक रोका जा सकता है। ऐसे नियमों के निर्धारण पर विनियामक रूप से ध्यान देना चाहिए, जो एल्गोरिथ्म्स के प्रचालन में निष्पक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उनको नियंत्रित कर सकें। आने वाले दिनों में, पूरे डिजिटल क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण बहस एल्गोरिथ्म्स से संबंधित जवाबदेही को लेकर होगी।

मैं तुम्हारे लोकतंत्र के प्रति लालसा रखता हूं

भारत और उसका लोकतंत्र, उसके क्षेत्र में सभी से अलग-थलग प्रकार का है। पश्चिम और उत्तर के उसके दो पड़ोसी केवल भारतीय अनुभव और संस्था का पतन देखने को लालायित हैं। लोकतांत्रिक भारत, उनके राष्ट्रों, जनता और समुदायों के रूप में उनकी स्थायी नाकामी है। आर्थिक स्तर पर कठोर परिश्रम,विद्वेषपूर्ण राजनीति और सीमा पार से फैलाया जा रहा आतंकवाद भारत को बहुलवादी और लोकतांत्रिक राजनीति के पथ से हटाने में असमर्थ रहे हैं। हालांकि हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि खुलेपन और बहुलवाद ऐसे कारक नहीं हैं, कि उनके महत्व की अनदेखी की जाए।

दो प्रवृत्तियों/वास्तविकताओं का मूल्यांकन बेहद गंभीरता के साथ किया जाना चाहिए। पहली, यह तकनीकी युग ऐसी अभूतपूर्व रफ्तार और पहुंच के साथ हस्तक्षेप करने की इजाजत देता है, जिस पर चुनाव की रक्षा करने वाली पुरानी संस्थाओं और राष्ट्र को संचालित करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। सक्रिय होने वाले उपकरण (प्रौद्योगिकियां और कॉर्पोरेट) अब राष्ट्र द्वारा नियंत्रित या स्वीकृत नहीं होंगे। छोटे और कमजोर राष्ट्रों को लागत और अपेक्षाकृत सुगमता इस विकल्प की ओर आकर्षित करती है। और, मतदाताओं का पक्ष जीतने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले आंकड़ों के संग्रह स्वयं लोकतंत्र पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। डिजिटल परिचालन की सबसे खतरनाक विशेषता दरअसल हस्तक्षेप करना या परिणामों को आकार देना नहीं है; यह केवल ऐसी धारणा बनाता है कि हस्तक्षेप करने से परिणाम विकृत हुआ — इस रणनीति का इस्तेमाल शीत युद्ध के दौरान पूर्व सोवियत संघ द्वारा लक्षित राष्ट्र के आत्मा को हतोत्साहित करने के लिए किया गया। इस पर प्रतिक्रिया वास्तविक और सामाजिक, वास्तविक और कथित दोनों तरह की होने की जरूरत होगी।

दूसरी और उपरोक्त से संबंधित ‘सर्वेलान्स कैपिटलिज़म’ (यानी लोगों की गतिविधियों और व्यवहारों की निगरानी के आधार पर जुटाये गए आंकड़ों का मुद्रीकरण) पर बढ़ती बहस तथा देशों और जनता पर पड़ने वाला इसका प्रभाव है। हालांकि इस विकृत ‘डेटा मर्केंटिलिज्म’ में कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं, भारत जैसे देशों में हम सार्वजनिक सम्पर्क की रूपरेखा के बारे में निर्णय लेने का जिम्मा कार्पोरेशन्स और मीडिया प्लेटफार्मों को सौंप रहे हैं। उपयोगकर्ता का संपर्क और विज्ञापन राजस्व बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए एल्गोरिथ्म्स अब ऐसी राजनीतिक भाषा को सीमित करने के लिए इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं, जिन्हें ये कम्पनियां आपत्तिजनक मानती हैं — और इस प्रक्रिया में ‘सर्वेलान्स डेमोक्रेसी’ का सृजन हो रहा है।

उपयोगकर्ता का संपर्क और विज्ञापन राजस्व बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए एल्गोरिथ्म्स अब ऐसी राजनीतिक भाषा को सीमित करने के लिए इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं, जिन्हें ये कम्पनियां आपत्तिजनक मानती हैं — और इस प्रक्रिया में ‘सर्वेलान्स डेमोक्रेसी’ का सृजन हो रहा है।

भारत, उसकी राजनीतिक पार्टियों, उसके कार्पोरेट्स और उसके क्षेत्रों में काम करने वालों और सबसे ज्यादा उसकी जनता को सतर्क रहने, मिलकर काम करने तथा इस चुनौ​ती से निपटने की जरूरत है, यह एक ऐसी वास्तविकता है, जो रोजाना घटित हो रही है। इनमें से हर एक ने सोच-विचार कर और अनजाने में चुनावों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को विकृत करने में योगदान दिया है और जब तक इनमें से हर एक पक्ष भारत के खजाने की सबसे महत्वपूर्ण परिसम्पत्ति के साथ अपने संबंध को फिर से निर्धारित नहीं करेगा, लोकतंत्र की मृत्यु और ह्रास के पीछे ‘किसी अंदरूनी व्यक्ति की सहायता’ होगी।बेशक इसके पीछे हाथ, ऐसा करने वाले और इससे लाभ उठाने वाले का आईपी ऐड्रेस कहीं और का हो।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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