BIMSTEC कारगर हो, इसलिए BBIN को दुरुस्त कीजिए

Samir Saran

अगर BBIN पर अमल कामयाब रहता है तो भारत के पास BIMSTEC में काम करने के लिए एक मॉडल होगा।

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स्रोत: PTI

नेपाल में BIMSTEC समिट से पहले बेहतर होगा अगर नई दिल्ली इस बात का आकलन कर ले कि उपमहाद्वीप को जोड़ने और इसके विकास से जुड़ी उसकी पहल की स्थिति क्या है। यह तथ्य है कि सार्क और बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार (BCIM-EC) के साथ BIMSTEC भी निष्क्रिय बना हुआ है। नतीजा यह है कि दक्षिण एशिया के देशों का आपसी कारोबार बिल्कुल डूबा हुआ है और इसका ख़मियाजा सबसे ज़्यादा भारत के प्रादेशिक नेतृत्व को भुगतना पड़ रहा है।

जिस इकलौती पहल में अब तक कुछ उम्मीद की झलक दिखती है, वह भारत, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल (BBIN) की पहल है जिसने 2015 में ऐतिहासिक मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट (MVA) किया — यह क्षेत्रीय जुड़ाव का अहम बिंदु था जिससे ‘उपक्षेत्रीयता’ के उभार की एक संभावना दिखती थी। मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट पर अमल के लिए भारत ने ख़ासी कूटनीति और पूंजी का निवेश किया है। फिलहाल विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक इंट्रा-रीजनल कारोबार दुनिया भर के कारोबार का बस 5% है — जो याद दिलाता है कि क्यों दक्षिण एशिया के अलग-अलग देश इसकी जगह कारोबार के भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर चीन की ओर मुड़ रहे हैं। दूसरी तरफ़ अगर ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी मज़बूत हो और सरहदों के आरपार कारोबार की सहूलियत बढ़े तो यह कारोबार 117 फ़ीसदी बढ सकता है जो फिलहाल 23 अरब US डॉलर का है।

वाकई, BIMSTEC से भी जुड़े बस तीन देशों को जोड़ने से जो आर्थिक संभावना पैदा हुई है, उससे ज़्यादा मुखर और विस्तारित क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के एजेंडे की संभावना समझ में आनी चाहिए। अगर भारत चाहता है कि BIMSTEC क्षेत्रीय आपसदारी के एक अहम मंच के तौर पर विकसित हो, तो इसमें BBIN की सफलता इरादे और क्षमता के प्रदर्शन के लिहाज़ से काफी अहम रहेगी। जब प्रधानमंत्री मोदी इस तैयारी में हैं कि काठमांडु में भारत के नेतृत्व वाली भूमिका का वे सिग्नल दे दें, तब मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट की प्रक्रिया में भारत की भूमिका का विश्लेषण यह समझने में मददगार होगा कि इस मामले में ठहराव की क़ीमत क्या है और भारत के प्रत्यक्ष नेतृत्व के सकारात्मक नतीजे कैसे आ सकते हैं।

सबसे पहले भारत को क्षेत्रीय संपर्क के मामले में लगातार अमल दिखाते हुए अपने नेतृत्व का प्रदर्शन करने की ज़रूरत है। ऐसे समय, जब बीजिंग की रोड और बेल्ट पहल पूरे महाद्वीप में उसके रणनीतिक समीकरणों को विस्तार दे रही है, तब इस साल मई में नेपाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रिश्तों की जो नई शुरुआत की है, वह इन देशों से जुड़ने के नए भारतीय रुझान को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। नेपाल दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए अहम है और BBIN और BIMSTEC की कनेक्टिविटी की योजनाओं से सबसे ज़्यादा फायदा उसे ही होने वाला है। इससे आसपास के बंदरगाहों तक उसकी पहुंच आसान होगी और वह नेपाल में बने सामानों का निर्यात दक्षिण एशिया में ही नहीं, उसके बाहर भी कर पाएगा। नेपाल का उदाहरण बताता है कि अगर भारत सरहदों के आरपार परिवहन को गति दे सके तो चीन के बनाए बंदरगाहों और बुनियादी ढांचों पर निर्भरता घटेगी और भारत ऐसी पहल को BIMSTEC के दूसरे देशों — बांग्लादेश, म्यांमार और थाइलैंड के साथ भी दुहरा सकता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि भारतीय दफ़्तरशाही की प्रशासनिक रुकावटों ने एक बार फिर इस प्रक्रिया में देरी पैदा की है। मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट के तहत मुसाफ़िरों और माल को ले जाने के प्रोटोकॉल पर दो साल से समीक्षा चल रही थी, मुसाफ़िरों का मामला अप्रैल 2018 में हुई आख़िरी बैठक में निबट गया था। दुर्भाग्यवश, भारत सरकार ने तय किया कि जब तक कार्गो प्रोटोकॉल पर बातचीत पूरी नहीं होती, मुसाफ़िरों के प्रोटोकॉल पर आख़िरी फ़ैसला रोका जाएगा। कार्गो प्रोटोकॉल पर बातचीत कुछ और दौर चलेगी। नई दिल्ली ने यह फ़ैसला किस तर्क से किया, यह साफ़ नहीं है, लेकिन उसके नतीजे साफ हैं — समझौते ने अपनी रफ़्तार खो दी है।

भारत सरकार ने इस गड़बड़झाले को कुछ और बढ़ा दिया जब उसने लगभग इसी समय नेपाल और बांग्लादेश को मोटर वेहिकिल ऐक्ट के त्रिदेशीय अमल पर एक ‘लेटर ऑफ एक्सचेंज’ पर दस्तख़त करने और भूटान से भी प्रति-हस्ताक्षर करने को कहा। इस अतिरिक्त समझौते के दस्तख़त में कुछ और मंज़ूरियों की ज़रूरत पड़ेगी। अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इससे कुछ और देरी बढ़ेगी।

ये देरियां अमूमन भारत के उलझे हुए क्षेत्रवाद का ही आईना हैं। MVA की ही तरह, BIMSTEC की मार्फ़त क्षेत्रीय जुड़ाव में देरी की क़ीमत आर्थिक और राजनीतिक तौर पर काफी बड़ी है। जबकि इसके सकरात्मक पक्ष भी उतने ही बड़े हैं — BIMSTEC और MVA के ज़रिए नई दिल्ली अपनी ‘ऐक्ट एशिया’ और ‘नेबरहुड फ़र्स्ट’ नीति के ढीले तार ठीक से कस सकती है।

इसी से दूसरा बिंदु निकलता है — अगर BBIN पर अमल कामयाब रहता है तो भारत के पास BIMSTEC में काम करने के लिए एक मॉडल होगा। फिलहाल BIMSTEC असमंजस में है — थाइलैंड, श्रीलंका और भूटान की प्रतिबद्धता इसमें पूरी नहीं दिख रही है। BBIN ब्लॉक के तीन देशों के बीच कारगर सड़क संपर्क दिखने का असर BIMSTEC देशों के बीच भी वांछित सहयोग का स्तर हासिल करने में प्रेरक बनेगा। चीन की बेल्ट-रोड पहल वाली दुनिया के बाद, चीन निर्मित बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे पर निर्भरता बढ़ेगी। भारत के लिए उप-क्षेत्रीयता की धमनियों को बचाए रखना ज़रूरी है और BBIN में इस विकल्प के बीज दिखते हैं। BBIN के मंच को आधार बनाते हुए, भारत को BIMSTEC को मज़बूत करने के लिए प्रचुर मात्रा में तकनीकी, मानवीय और वित्तीय संसाधन लगाने के लिए प्रतिबद्ध और तैयार रहना चाहिए।

तीसरी बात, BIMSTEC में निजी क्षेत्र को और ज़्यादा शामिल किए जाने की ज़रूरत है। शायद BBIN की सबसे बड़ी चूक अपनी क्षेत्रीय पहल में निजी क्षेत्र को शामिल करने में भारत की नाकामी रही। मिसाल के तौर पर, कोलकाता-ढाका-अगरतल्ला और दिल्ली-कोलकाता ढाका के रूट पर जो ट्रायल रन हुआ, उससे सफर का काफी समय ही नहीं बचा, यात्रा की लागत भी क़रीब 20 फ़ीसदी घट गई। तो BBIN के संपर्क के फायदे सभी तीनों देशों के माइक्रो, छोटे और मझोले उद्यमों तक, क्षेत्रीय क़ीमत-शृंखला के निर्माण तक, और प्रयोग और उद्यमिता को बढ़ावा देने तक जाते हैं। नई दिल्ली को यह समझना होगा कि बातचीत के दौरान निजी क्षेत्र की पर्याप्त नुमाइंदगी से वे ऑपरेशनल मुद्दे सामने आएंगे जो कंपनियों की लॉजिस्टिक ज़रूरतों के लिहाज से प्रासंगिक होंगे और MVA को — और साथ ही BIMSTEC के तहत होने वाली कनेरक्टिविटी की पहल को — सच्चे अर्थों में बड़े बदलाव का वाहक बनाएंगे।

अगर भारत को दक्षिण एशिया में अपनी राजनीतिक और आर्थिक अहमियत बनाए रखनी है तो उसे इस इलाक़े को जोड़ने की प्रक्रिया का नेतृत्व करना होगा। यह हो सके, इसके लिए नई दिल्ली को अपनी अंदरूनी निर्णय प्रक्रिया और इसके तंत्र का फिर से मूल्यांकन करना होगा। मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट में ग़ैरज़रूरी देरी अपने ही ऊपर चोट है — जिससे दिल्ली को खुद को बचाना होगा, चूंकि वह BIMSTEC में कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका अख़्तियार करने जा रही है। BBIN के मोटर वेहिकिल ऐग्रीमेंट की ही तरह, BIMSTEC भी भारत के लिए एक आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक अवसर है कि वह अपने पड़ोसी देशों से कुछ उलझे हुए रिश्तों को सुधार ले। प्रधानमंत्री कार्यालय को इस मामले में दख़ल देना होगा और इस इलाक़े की कनेक्टिविटी पर भारतीय नेतृत्व को नई ऊर्जा देनी होगी ताकि प्रधानमंत्री की एक अहम महत्वाकांक्षा का लक्ष्य हासिल किया जा सके।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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