इतिहास का बदला: यूरेशिया का उदय

Samir Saran

क्या भारत 21वीं सदी को परिभाषित करने वाले यूरेशिया और हिंद-प्रशांत के दोराहे पर खड़ा है?

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नासा का ब्ल्यू मार्बल प्रोजेक्ट

“हिंद-प्रशांत” खबरों में है। अमेरिका ने अपनी प्रशांत कमान का नाम बदलकर “हिंद-प्रशांत कमान” रख दिया है, भारत और इंडोनेशिया द्वारा रेखांकित साझा क्षेत्रीय विज़न इसकी केंद्रीयता को प्रमुखता देता है और भारत के लिए इस क्षेत्र का राजनीतिक महत्व सिंगापुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विदेश नीति से संबंधित भाषण का केंद्र था। ये सब चीन के हैरान कर देने वाले उदय का जवाब है। यदि ये सब क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए विभिन्न ताकतों की भविष्य में बनने वाली सहमति का संकेत है, तो यह उपाय महत्वपूर्ण भले ही हो, लेकिन एशिया और यूरोप में फैले चीन के प्रोजेक्ट के लिए नाकाफी है।

धरती की सतह के 35 प्रतिशत भूभाग को कवर करने वाला यूरेशिया 90 से ज्यादा देशों में रहने वाले 5 बिलियन बाशिंदों का घर है, जो वैश्विक जीडीपी के 65 प्रतिशत के लिए उत्तरदायी हैं। सहस्त्राब्दि भर से फतह, व्यापार और प्रवासन ने एशिया और यूरोप को मूलभूत रूप से बांध रखा है — इस विशाल भूभाग में फैली महान सभ्यताओं का उतार-चढ़ाव अनगिनत राजनीतिक और आर्थिक गतिशीलताओं का परिणाम है।

अभी हाल तक, ऐतिहासिक संदर्भ में, यह सब निर्बाद रूप से जारी था। यूरोप की औद्योगिक क्रांति और उसके बाद एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद ने ‘पश्चिम में’ आर्थिक और सैन्य ताकत एकत्र करते हुए क्षेत्र में एक ऐसी कृत्रिम दरार उत्पन्न कर दी जिसका कोई भौगोलिक वजूद नहीं था। यह समुदाय दूसरे विश्व युद्ध का विजेता बनकर उभरा, जिसने केवल सत्ता के इन ढांचों और क्षेत्रों को संस्थागत रूप प्रदान कर दिया।


एशिया का समकालीन आर्थिक उत्कर्ष और उसके अपने समुदायों तथा बाजारों का एकीकरण तेजी से इस यथास्थिति को तितर-बितर कर रहा है। मौजूदा दौर में एक बार फिर से पूरे यूरेशिया में लोगों, वस्तुओं, नवाचार और वित्त का प्रवाह अपेक्षाकृत मुक्त रूप से हो रहा है। लेकिन इस सुपर कॉन्टिनेंट का नए सिरे से उदय टकरावों से अछूता नहीं है। ये नई एकीकृत भू-आर्थिक ताकतें नए राजनीतिक तनाव अपने साथ लेकर आईं हैं।


जिस तरह इतिहास खुद को दोहरा रहा है और यूरेशिया एकजुट हो रहा है, ऐसे में नई विश्व व्यवस्था की रूपरेखा इस आधार पर परिभाषित होगी कि इसका प्रबंधन कौन करेगा और इसका प्रबंधन किस तरह होगा। इसी सुपर कॉन्टिनेंट में लोकतंत्र, मुक्त बाजारों और वैश्विक सुरक्षा प्रबंधों का भविष्य तय होगा और इस परिदृश्य में तीन प्रमुख कारक आकार ले रहे हैं।

पहला, रॉबर्ट केपलान का यह कथन उद्धृत करना होगा कि यह भूगोल का बदला है। हालांकि यूरेशिया का एकीकरण स्वाभाविक है, लेकिन उसका वर्तमान ‘अवतार’ निश्चित रूप से चीनी है। यूरोप और एशिया के बीच की दरार को कृत्रिम, आधुनिक और “पश्चिम” द्वारा बनाई गई मानने के बाद चीन ने यूरेशिया को समझने, परिभाषित करने और फिर उसका प्रबंधन करने जैसे ऐसे कदम उठाए, जिन्हें करने का उत्साह किसी अन्य ताकत ने नहीं दिखाया।

यूरेशियाई सुपर कॉन्टिनेंट का विचार अपने आप में नया नहीं है: 1904 में, हेल्फोर्ड मेकिंडर ने अनुमान व्यक्त किया था कि पश्चिमी नौसैनिक श्रेष्ठता का युग ताकत कायम करने की राह तैयार करेगा, जिसमें यूरेशिया — “मुख्य केंद्र” — विश्व वर्चस्व का आधार होगा।

ब्रिटिश, अमेरिकी, जर्मन और रूसी रणनीतिकार लम्बे अर्से से इस विचार द्वारा प्रभावित रहे हैं। ज्बिगनीव ब्रेजजिंस्की ने लिखा कि सोवियत संघ को नियंत्रित करने का आधार “यूरेशिया की बिसात पर” अमेरिकी प्रभाव का विस्तार करना था। जबकि रूसी दार्शनिक अलेक्सांद्र दुगिन का विचार था कि रूस के नेतृत्व वाला यूरेशिया नेटो की “अटलांटिकवाद” की साजिश को प्रभावशाली ढंग से नाकाम कर देगा। प्रत्येक मामले में, विषय स्पष्ट था: भूमि आधारित सैन्य आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से प्रतिस्पर्धी ताकतों को संतुलित करना।

चीन की योजना अलग है — भूराजनीतिक ब्लॉक्स की बजाए सुविधा पर आधारित गठबंधनों द्वारा परिभाषित परस्पर निर्भर वैश्विक अर्थव्यवस्था में, चीन का विस्तार ऊर्जा की आपूति, कच्चे माल और बाजार की तलाश में मल्टी डॉलर वाली भूराजनीतिक प्रेरणा से परिभाषित है।


चीन की पसंद बेल्ट एंड रोड ​इनिशिएटिव है, जिससे कनेक्टीवि​टी प्रोजेक्ट्स का विशाल नेटवर्क तैयार हो रहा है—उनमें से प्रत्येक की इस सुपर कॉन्टिनेंट के भूगोल में चीन की अर्थव्यवस्था पर अंतर्निहित निर्भरता है।


चीन की प्रेरणा का आधार विचारधारा नहीं, बल्कि दोबारा प्रचलित होने तथा विश्व में सांस्कृतिक, आर्थिक और सैन्य केंद्र होने की अपनी ऐतिहासिक स्थिति का विस्तार करने की इच्छा है। चीन के आर्थिक महत्व के साथ ही साथ यह अभियान साधारण रूप से संतुलन बनाने वाली रणनीतियों के स्थान पर अपने यूरेशियाई विजन को महत्वपूर्ण रूप से और ज्यादा प्रबल, दूरदर्शी तथा स्थायी बनाता है।

ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि बीआरआई उप-क्षेत्रों के भूभाग का महत्व कम करता है, इस प्रकार स्थापित सत्ता संतुलनों को अस्थिर करता है। मिसाल के तौर पर भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) यूरेशिया की राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा वार्ताओं में चीन के धीरे-धीरे बढ़ते प्रभाव पर काबू पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

मुक्त और खुला” हिंद-प्रशांत विजन और क्वाड्रीलैटरल इनिशिएटिव जैसे नवविकसित मंच सामुद्रिक मोर्चे पर चीन के उदय को संतुलित बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। महासागर, हालांकि चीन का महज एक मंच भर है और ऐसे में विशुद्ध रूप से सामुद्रिक जवाब नाकाफी है।

चीन बेहतरीन तरीके से इस प्रोजेक्ट: बुनियादी ढांचे का निर्माण करने और व्यापार को सुगम बनाने तथा वैश्विक संस्थाओं का विकल्प तैयार करने में अनवरत रूप से जुटा हुआ है। चीन लुके-छिपे ढंग से अपने राजनीतिक मॉडल: “चीनी विशेषताओं से युक्त पूंजीवाद” — सरकारी पूंजीवाद और अधिनायकवाद के अनोखे मिश्रण का निर्यात भी कर रहा है। जब तक उदार लोकतंत्र यूरेशिया में — एशिया और अफ्रीका में बुनियादी ढांचे और शासन की जरूरते प्रभावी ढंग से पूरी करने वाले ​विकल्प को प्रस्तुत नहीं करते, तब तक चीन का प्रस्ताव कामयाब होता रहेगा।

यहीं दूसरे कारक की बारी आती है: लोकतंत्र का बदला। चाहे अमेरिका हो या यूरोपीय संघ या भारत, लोकतंत्रों का पहले से कहीं ज्यादा ध्रुवीकरण हो चुका है। द प्यू ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे लगातार यह दर्ज कर रहा है कि लोकतांत्रिक सरकारों का विश्वास अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुका है। ऐसा लगता है कि पहली बार उदारवादी लोकतंत्र इतने जटिल हालात में पहुंच चुके हैं कि उनके पास रणनीतिक योजनाएं बनाने के लिए ज्यादा ऊर्जा ही नहीं बचती। ऐसे समय में जहां एक ओर चीन का दस साल का घटनाक्रम है, वहीं लोकतंत्र अपने अगले चुनावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

और अंतिम कारक, जनसांख्यकी है, जो समूचे क्षेत्र, खासतौर पर चीन के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। बहुत से यूरेशियाई देशों में, बीआरटी के आर्थिक लाभ जाहिर हैं। हालांकि ऐसे दौर में, जब राष्ट्रवाद राजनीति का मूड परिभाषित कर रहा हो, ऐसे में चीन की मौजूदगी अप्रिय हो सकती है। चीन का श्रम निर्यात युवा आबादी वाले मेजबान देशों में तनाव उत्पन्न कर रहा है, जो अब रोजगार के अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस बात का खतरा है कि बीआरटी अस्थिर देशों में केवल उग्र और कट्टर संगठनों के लिए बुनियादी सुविधाओं के नेटवर्क तैयार करेगा।

घरेलू स्तर पर, जनसांख्यकीय दबाव चीन को अपेक्षाएं पूरी करने की उसकी योग्यता पर पुनर्विचार करने के लिए मजूबर कर सकते हैं। जैसे-जैसे चीन की युवा आबादी आमदनी की सीढ़ी चढ़ेगी, अपनी सरकार से उनकी अपेक्षाएं बढ़ेंगी। साथ ही साथ, शहरी क्षेत्रों में अकेले युवाओं की अधिकता और उम्रदराज होती गांवों की आबादी के कारण चीन के समाज में हिंसा और अशांति का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। ये जनसांख्यकीय दबाव यूरेशियाई एकीकरण के प्रोजेक्ट के लिए क्या पूर्वाभास देंगे? क्या चीन के पास दुनिया भर में प्रभाव को अंधाधुंध खरीदने के लिए राजनीतिक पूंजीवाद या पॉलिटिकल कैपिटल होगी? क्या जनसांख्यकीय जटिलताएं अन्य देशों को बीजिंग सर्वसम्मति से निपटने की जल्दी से कोई व्यवस्था तैयार करने की इजाजत देंगी?


भारत में, यह बात इससे ज्यादा स्पष्ट नहीं हो सकती कि भारत का विकास का मार्ग जटिलता से यूरेशिया से बंधा है। भारत 21वीं सदी को परिभाषित करने वाले यूरेशिया और हिंद-प्रशांत दोनों क्षेत्रों के दोराहे पर है।


भारत, हालांकि ऐसे देशों के समूह में से एक होगा और उनके विजन के अनुसार खुद को ढालने, और तो और उस विजन को आकार देने की उसकी योग्यता आने वाले दशकों में यूरेशियाई वार्ताओं को प्रभावित करेगी।

रूस, जो अपनी आर्थिक जरूरतों और अमेरिकी ताकत के प्रति साझा नफरत के कारण चीन से कमजोर स्थिति में है, चीन के प्रति प्रतिकूल संबंध रखता है। इस वास्तविक यूरेशियाई सुपर पॉवर की हैसियत इस समय गौरवशाली पुलिसकर्मी — या ज्यादा उदारता से कहें तो चीनी विस्तारवाद के लिए चतुर जोखिम प्रबंधन सलाहकार — से ज्यादा नहीं है।

जिन दो आर्थिक विजनों को वे एकीकृत करना चाहते हैं वे — बीआरआई और यूरेशियाई आर्थिक संघ हैं, जो विविध तर्कों के अंतर्गत ऑपरेट करते हैं। इनमें से पहला चीन को व्यापार के वाहक के रूप में स्थापित करने की मंशा से बाजारों को नए सिरे से स्थापित करना चाहता है, जबकि दूसरा रूस के सीमित आर्थिक प्रभाव का विस्तार करने के लिए एकल बाजार का निर्माण करना चाहता है। साथ ही, रूस की चिंता का सम्मान करते हुए, चीन अब तक क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को टालता आया है — जिसका दीर्घकाल तक टिकाऊ रह पाना मुश्किल है।

रूस की साधारण क्षेत्रीय क्षमता और चीन की बहु-महाद्वीपीय महत्वाकांक्षा के अंतर से यह प्रश्न उठता है : क्या हो अगर दोनों स्वायत्तता और भौतिक रूप से यूरेशिया के दो अलग विजन्स तक पहुंचे? या उन दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से ही अस्थिर क्षेत्र में जटिल सुरक्षा गतिशीलता की रचना कर दें?


दूसरी ओर, यूरोपीय संघ यूरेशिया को मुश्किल मान रहा है। एशिया की राजनीतिक अस्थिरता से अलग-थलग, यूरोप ने सत्ता की राजनीति को छोड़ दिया है और अमेरिकी सुरक्षा की छाया तले बहुसंस्कृतिवाद का अपना विजन विकसित कर लिया है।


हालांकि पश्चिम एशिया में फूट के कारण, शरणार्थियों की भीड़ पहले से कर्ज में डूबी ​अर्थव्यवस्थाओं में जा पहुंची है, जिसने यूरोपीयनों को महाद्वीप के साथ अपनी निकटता याद दिलाने के लिए बाध्य कर दिया है।

अब यूरोप भीतर और बाहर से टूट चुका है। यहां तक उम्रदराज होते यूरोपीय समाज प्रतिक्रियावादी लोकप्रियता और सुस्थापित राजनीतिक और आर्थिक सर्वसम्मति के विघटन से जूझ रहे हैं, उनकी सीमाएं बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव द्वारा धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं। यूरोपीय संघ को अब हर हाल में कुछ मुश्किल फैसले लेने होंगे: या तो अपनी एजेंसी के संरक्षण और विस्तार में जुटना होगा या एक समय पर एक ही काम करना होगा।

अमेरिका ने, अपनी ओर से पिछले नौ दशकों के दौरान, इन दोनों क्षेत्रों में अपने लिए विशिष्ट स्थान बरकरार रखने के लिए रक्त और धन बहाया है। हालांकि, रूस और चीन को संतुलित करने के प्रयास और “आतंकवाद के खिलाफ युद्ध” करने में उसकी ताकत और प्रभाव नेटो, केंद्रीय कमान और हाल में नए नाम पाने वाली ‘हिंद प्रशांत’कमान के बीच बिखर कर रह गए हैं, जिनकी अपनी रणनीतियां और विरासत हैं। क्या अमेरिका, अब अनपेक्षित रूप से आर्थिक राष्ट्रवाद के साथ खिलवाड़ करते हुए, जवाब देने की अपनी संस्थागत क्षमता से ज्यादा तेजी से संयुक्त और एकीकृत हो रहे विश्व में नेतृत्व का दावा कर सकता है?

महत्वपूर्ण होगा कि सभी और ​खासतौर पर भारत और अमेरिका, हिंद-प्रशांत से परे यूरेशिया के केंद्र में व्यवस्था की कल्पना करें। यह कल्पना लोकतंत्र के मानदंड संबंधी विचारों को नजरंदाज करते हुए, यूरेशियाई भूराजनीति वित्त और प्रौद्योगिकी के प्रावधानों, सम्पर्क तथा व्यापार तथा विविध राजनीतिक व्यवस्थाओं को समायोजित करने की इच्छा द्वारा परिभाषित होगी।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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