उम्मीद की किरण है निजता के अधिकार पर फैसला

Samir Saran

सरकार को निजता के अधिकार से जुड़े हाल ही के न्यायिक फैसले को उम्मीद की किरण की तरह देखना चाहिए।

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भारतीयों के निजता के मौलिक अधिकार की पुष्टि करने वाला उच्चतम न्यायालय का हाल का 547 पृष्ठ का फैसला टेक्नोलॉजी कम्पनियों के लिए किसी नई जानकारी सरीखा नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने केवल वही संहिताबद्ध किया है, जो इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स और कारोबार के लिए धर्मसिद्धांत रहा है: उपयोग करने वालोंकी दुनिया (यानी यूज़र्स स्पेस) उनका व्यक्तिगत स्थान है, जहां कदम रखने से पहले कम्पनियों, सरकारी या सरकार से इतर निकायों (यानी नॉट स्टेट एक्टर्स) को आवश्यक तौर पर अनुमति लेनी चाहिए।

आधार और उससे संबंधित व्यवस्था के तकनीकी स्वरूप को भी अब न्यायालय द्वारा निर्धारित किए गए कानूनी मानक के समक्ष परखा जाएगा, लेकिन सरकार को इस फैसले को उम्मीद की किरण की तरह देखना चाहिए।

इस फैसले में पर्याप्त संकेत हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि उच्चतम न्यायालय बायोमिट्रिक-आधारित प्रमाणित प्लेटफॉर्म को उपयुक्त मान रहा है। दरअसल, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस बात को रेखांकित हुए विशाल आंकड़ों के माध्यम से बेहतर शासन की संभावना बल दिया है कि यह ‘नवोन्मेष और ज्ञान के प्रसार’ को प्रोत्साहित कर सकता है और ‘समाज कल्याण से संबंधित फायदों के छितराव या अपव्यय’ पर रोक लगा सकता है।

न्यायालय का फैसला सरकार को “निजता के अनुरूप आधार” तैयार करने के लिए प्रेरित कर सकता है, लेकिन इसके लिए दूरदर्शियों और निर्माताओं द्वारा गंभीर और व्यवस्थित चिंतन किए जाने की आवश्यकता होगी। निजी क्षेत्र को भी उपभोक्ताओं को प्रस्तुत किए जा रहे उत्पादों और वचनबद्धता के मूल में “आंकड़ों की शुद्धता” और निजता को रखकर चलना होगा।

शुरूआत में, सरकार को आधार की सबसे बड़ी कमियों — उसके केंद्रीकृत डिजाइन और तादाद में बढ़ने वाले संयोजनों यानी लिंकेज के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

केंद्रीय आधारभूत आंकड़े  एकल, और अक्सर अपरिवर्तनीय विफलता का आधार तैयार करते हैं। सरकार को आवश्यक तौर पर आधार के आधारभूत आंकड़ों को विकेंद्रीकृत करना चाहिए। दूसरा, आधार आवश्यक रूप से एक अनुमति-आधारित व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें केवल यूआईडी के आधारभूत आंकड़े से ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी अनेक सेवाओं में शामिल होने और उनसे बाहर जाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यह आवश्यक तौर पर पारदर्शी, सुगम और उपयोग सुलभ प्रक्रिया होनी चाहिए।

“निजता के अनुरूप” आधार के साथ, सरकार न सिर्फ उच्चतम न्यायालय के फैसले का पालन करेगी, बल्कि वह विश्व की सबसे अनूठी शासन व्यवस्था प्रस्तुत करने के करीब भी होगी, यह एक ऐसा अद्भुत कार्य है, जिसे प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत अमेरिका और चीन जैसे राष्ट्र भी कर पाने में नाकाम रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर, इस क्षेत्र में चीन के प्रयासों को ही लीजिए। वर्ष 2015 में, चीन की सरकार ने अपनी विशाल,बड़े पैमाने पर  विनिर्माण करने वाली अर्थव्यवस्था का डिजिटीकरण करने और एक डिजिटल समाज की रचना करने से संबंधित एक राष्ट्रीय परियोजना का प्रारंभ किया। इस परियोजना को ‘इंटरनेट प्लस’ का नाम दिया गया, जिसका लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को सम्पूर्ण रूप से ‘सूचना आधारित बनाना’ (यानी उसका इंफॉर्मेशनाइजेशन करना) था तथा संग्रह किए गए आंकड़ों का उपयोग नागरिकों को बेहतर सार्वजनिक और निजी सेवाएं उपलब्ध कराने में किया जाना था। चीन के पास पूंजी या आईसीटी अवसंरचना की कोई कमी नहीं थी, लेकिन ‘इंटरनेट प्लस’ पहल ज्यादा सफल नहीं हो सकी और न ही उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही कोई स्वीकारोक्ति ही मिल सकी। इस परियोजना को एक बुनियादी कमी का खामियाजा उठाना पड़ा : चीन को यकीन था कि व्यक्तिगत तौर पर पहचान योग्य आंकड़ों से लेकर उपयोगकर्ताओं के व्यवहार संबंधी ज्यादा जटिल पद्धतियों तक की जानकारी एकत्र करके सरकार भविष्य की आर्थिक प्रगति, उपभोग की परिपाटियों और वास्तव में सामाजिक या राजनीतिक एजेंडे के मध्यस्थ के तौर पर उभरेगी।

लेकिन डिजिटल व्यवस्था के प्रति विश्वास,  जैसा कि प्रौद्योगिकी समर्थ सोशल-इंजीनियरिंग के प्रति चीन की सरकार के नाकाम प्रयासों से जाहिर होता है,  केवल उन्हीं जरूरतों को पूरा करके कायम किया जा सकता है, जिनका दायरा अभिव्यक्ति, राजनीतिक संवाद और आर्थिक सचलता की आजादी की मांग तक सीमित हो। अपने संकीर्ण शासन मॉडल के कारण, चीन इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के बीच ऐसा विश्वास कायम करने में विवादास्पद रूप से नाकाम रहा। इस विशाल डिजिटल परियोजना को अमल में लाने में चीन को मिली नाकामी भारत के लिए सबक है।

यदि ‘आधार’ जैसी परियोजना को सफल बनाना है, तो उसका बुनियादी दर्शन आवश्यक तौर पर दो लक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए : पहला,  इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की बढ़ती तादाद के बीच भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास और भरोसा बढ़ाना और दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि डिजिटल प्लेटफॉर्म में नवोन्मेषों की परिणति आर्थिक और रोजगार के अवसरों तक पहुंच बढ़ाने में भी हो।

निजता के अनुरूप ‘आधार’ व्यक्ति और सरकार के बीच भरोसा जगाता है, सरकार को सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने संबंधी अपने दृष्टिकोण को नए सिरे से परिभाषित करने की इजाजत देता है। आधार इंटरफेस, जिस पर यूपीआई और अन्य नवोन्मेष निर्भर करते हैं, सामाजिक सुरक्षा का ‘विविध अर्थों वाला’ मॉडल तैयार कर सकता है, जहां समान अनुप्रयोग (यानी एप्लीकेशन्स) डिजिटल प्रमाणन, नकदी रहित हस्तांतरण (यानी कैशलेस ट्रांसफर्स), ‘सबके लिए आमदनी’ (यानी यूनिवर्सल बेसिक इनकम) के जरिए वित्तीय समावेशन, कौशल विकास और स्वास्थ्य बीमा जैसी विविध प्रकार की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। लेकिन शासन के ऐसे मॉडल किसी जबरदस्ती या अनिवार्यता  पर आधारित नहीं होने चाहिए। यह बेहद प्रशंसनीय है कि देश के राजनीतिक वर्ग ने न्यायालय के फैसले को स्वीकार किया है, भाजपा के अमित शाह जैसे नेताओं ने ‘सुदृढ़ निजता की संरचना’  तैयार करने और उस बारे में सिफारिशें करने संबंधी श्रीकृष्ण समिति के प्रयासों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पुष्टि की है।

यूआईडी प्लेटफॉर्म के बारे में वर्तमान में जारी बहस से इसके प्रबंधन के लिए सरकार की जवाबदेही जैसा महत्वपूर्ण सुधार गायब है । इस उद्देश्य के लिए आधार में मुख्य निजता अधिकारी या दरअसल ‘निजता नीतिशास्त्री’ होना चाहिए, जो टेक्नोलॉजी कम्पनियों से भिन्न न हो जो सुदृढ़ स्वायत्तता के साथ शिकायतों का आकलन, निजता के संभावित उल्लंघनों का परीक्षण और पड़ताल कर सके।

आधार पर आधारित व्यवस्था, जो निजता के अनुरूप भी है और पिरामिड के आकार वाली वित्तीय संरचना की बुनियाद की निर्माता भी है, वह अन्य उभरते बाजारों को भी भारत की सहायता से इस प्लेटफॉर्म को अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।

कम्पनियां और प्लेटफॉर्म इस बात को अवश्य स्वीकार करें कि निजता और आंकड़ों को शुद्धता के प्रति  ब्लैक बॉक्स का वादा लम्बे अर्से तक पर्याप्त नहीं रहेगा। इन प्रतिबद्धताओं को आवश्यक तौर पर व्यापक पैमाने पर व्यक्त किया जाना चाहिए और उनके साथ संलग्न प्रत्येक उपयोगकर्ता तक प्रेषित किया जाना चाहिए। प्रमुख स्थानों पर उपयोगकर्ताओं (यानी यूजर्स)और नियंत्रकों  के साथ संपर्क के लिए आंकड़ों की शुद्धता के निरीक्षक नियुक्त किए जाने चाहिए।

भारत की डिजिटल प्रगति की दास्तान आवश्यक तौर पर उसकी जनता द्वारा और उसकी जनता के लिए लिखी जानी चाहिए।  भारत सरकार की हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण भूमिका है — उसे नागरिकों तक विश्वनीय, किफायती और गुणात्मक इंटरनेट पहुंच उपलब्ध कराने वाले टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म शुरू करने चाहिए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को एक ऐसा साहसिक राजनीतिक, कानूनी और दार्शनिक विवरण स्पष्ट करना चाहिए, जो देश और विदेश में, सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के संगठनों द्वारा नवोन्मेष को प्रेरित कर सके। निजता के अनुरूप आधार के साथ, यह विवरण डिजिटल नेटवर्कस द्वारा समर्थ अधिकारप्राप्त, समावेशिता और समृद्धि में से एक हो सकता है।


इस लेख का लघु संस्करण द इकॉनोमिक टाइम्स में प्रकाशित हुआ है

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